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कैसे करें परम आनंद का अनुभव, ध्यान के 10 सूत्र जानें संतों से सिर्फ संतवाणी चैनल पर

खुशियां दो प्रकार की होती हैं….एक आध्यात्मिक और दूसरी इन्द्रियों पर आधारित खुशी। हम इन दोनों के बीच किस तरह से सामंजस्य विकसित कर सकते हैं? शिवाजी राव, 66 वर्ष

हर व्यक्ति खुश रहना चाहता है लेकिन किसी को भी अपनी मनचाही खुशी नहीं मिलती। हमारे लिए खुशी का अर्थ कुछ भी हो सकता है, कोई खूबसूरत आध्यात्मिक अनुभव या फिर इन्द्रियों को भा जाने वाला कोई क्षण।

कभी-कभार खुशियां हमारे हाथ में आती हैं और फिर अचानक से फिसल जाती हैं। खुशियों के लिए हमारी ये खोज निरंतर चलती रहती है। लेकिन खुशी तो त्वरित होती है, कोई चीज खोई और अचानक मिल गई… हमें यह बात भी कभी नहीं भूलनी चाहिए कि जब सुख आता है तो दुख भले ही अपने आप ही गायब हो जाए, लेकिन वह दूर नहीं होता।

वास्तव में, हमें परमानंद की प्राप्ति करने के विषय में सोचना चाहिए क्योंकि खुशियों के लिए हमारी तलाश कभी समाप्त नहीं होगी। ये दोनों एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हैं। आप दो पल की खुशियों को लेकर कभी आश्वस्त नहीं हो सकते लेकिन परमानंद कभी ना समाप्त होने वाला है।

कभी आपने सोचा कि जिस परमानंद की हम बात कर रहे हैं वह आपको कहां मिल सकता है?

अपने भीतर झांकें….जो आपको दिखाई दिया वही आपका वास्तविक स्वभाव है। भगवद् गीता में लिखा है “परमानंद की इच्छा रखना आत्मा का स्वभाव है। ईश्वर परमानंद का सागर है और हम सभी उस ईश्वर के मामूली से हिस्से।“  

मनुष्य के लिए स्वयं को जानना और अपनी वास्तविकता के साथ पंक्तिबद्ध होना बहुत मुश्किल है।

जब आप परम सुख के साथ जुड़ते हैं तो जीवन वास्तविक रूप में खूबसूरत हो जाता है।

यह खुशहाली का एक अलग ही स्तर है, एक योगी की तरह आप भी जीवन में होने वाले परिवर्तनों से आहत नहीं होंगे और ना ही भौतिक संसार की हलचल आपको प्रभावित कर पाएगी।

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